ऑस्ट्रेलिया में रह कर याद आती अपने नगर की रामलीला:पूजा व्रत गुप्ता

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उत्तर प्रदेश (इटावा):-

जसवंतनगर।अभी कुछ दिन पहले की बात है, यहाँ ऑस्ट्रेलिया में रात के तकरीबन 11 बज रहे थे। मैं सोने ही वाली थी कि अचानक पापा का कॉल आया। वीडियो कॉल था, फ़ोन उठाया तो चौंक गई। सामने स्क्रीन पर पापा नहीं, मेरा मोहल्ला था। मोहल्ले में भीड़ थी, भीड़ के शोर – शराबे में गूँजते भजन थे और मेरे पुराने घर के सामने वाला वो चबूतरा था, जिसे हम राजगद्दी कहते। चबूतरे पर विमान रखा था और विमान विराजमान थे , राम, सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और हनुमान। अचानक ये सब देखकर हज़ारों मील दूर बैठी मैं भावुक थी और आश्चर्यचकित भी क्योंकि पिछले ही दिनों मुझे ये ख़बर मिली थी कि इस बार कोरोना के चलते क़स्बे की 160 साल से ज़्यादा पुरानी रामलीला स्थगित कर दी गयी है। किंतु वो सब देखकर मुझे बाद में पता चला कि रामलीला कमेटी ने अपने प्रयासों से इस परंपरा को जारी रखते हुए 15 दिन तक किसी बड़े त्यौहार की तरह मनाई जाने वाली इस ऐतिहासिक रामलीला को एक औपचारिकता के तौर पर महज कुछ ही घंटों में निपटा दिया है। ये बात ख़ुशी भी देती है और दुःख भी… क्योंकि हम क़स्बे वालों के लिए ये सिर्फ रामलीला ही नहीं बल्कि एक ऐसा त्यौहार है, जिस पर बेटियाँ ससुराल से पीहर लौट आना चाहती हैं। बड़े शहरों में नौकरी को गए लोग घर आना चाहते हैं। घर की महिलाएं मेले में सजी दुकानों का इंतज़ार करती हैं ताकि चाय के पुराने प्याले बदले जा सकें। विमान का इंतज़ार करते बच्चे , शाम होते ही चबूतरों को गुलज़ार करते हैं। धर्म भले ही कोई भी हो मेरे क़स्बे में हर कोई राम जी का विमान देखने के लिए लालायित रहता है, जैसे मैं रहती थी बचपन में। बचपन की राम लीला  तब दोपहर के 2 बजते ही स्कूल का बस्ता फेंक मैं और मोहल्ले के बाकी बच्चे उस मंदिर की ओर दौड़ लगा देते जहाँ राम ,सीता और लक्ष्मण का श्रृंगार किया जाता। मेरा घर मंदिर के बिल्कुल पास था तो हम सब टोलियाँ बनाकर भगवान के दर्शन को जाते। इधर पंडित जी उन बालकों का श्रृंगार करते और उधर हम दूर खड़े हाथ जोड़कर मन में प्रार्थना कर रहे होते। ये वो वक़्त था जिसने मुझे इंसानों में भगवान का स्वरूप दिखाया और अटूट विश्वास दिलाया कि वो हमारी सारी प्रार्थनाएँ सुनते हैं। बचपन की रामलीला --------------------------- बचपन में जब हर बात पर बड़ी आसानी से विश्वास हो जाता था, इस बात पर भी हुआ कि ये जो रामरज लगे चेहरे विमान पर बैठकर हमारे मोहल्ले से निकलते हैं ये भगवान हैं और हमें सब कुछ दिला सकते हैं, हर मुश्किल से बचा सकते हैं। इसलिए हम बच्चे हाथ जोड़कर, सर झुकाये उन दिनों सब कुछ इन्हीं से माँगते… मेले का वो खिलौना जो पसंद आया हो पर हमारी नन्ही मुट्ठी में उसे खरीदने के पैसे ना हो, वो दोस्ती जो पिछली शाम सहेली से लड़ाई करके टूट गयी हो, केला मैया के मेले से खरीदी वो गुल्लक जो कई दिनों से सिक्के डालने के बाद भी भरी ना हो, वो होम वर्क जो पूरा करना भूल गए हैं और ना जाने क्या – क्या। तब सारी शिकायतें और फ़रमाइशें दस बारह दिन इन्हीं राम, लक्ष्मण ,सीता के स्वरूपों से होती थीं और विश्वास तब और बढ़ जाता जब पापा रात को घर आते हुए वो खिलौना हाथ में ले आते या दूसरे दिन वो रूठी हुई सहेली मुस्कुरा देती, ग्रह कार्य पूरा ना होने पर स्कूल में आचार्य जी चिल्लाते नहीं और बाबा गुल्लक में डालने के लिए एक अठन्नी ज्यादा दे देते। यही वक़्त था जब मैंने भगवान पर अटूट विश्वास करना सीखा। विमान के हर बार गली से गुजरते ही हम सब बच्चे मिलकर “राम जी! राम जी!” चिल्लाते । हमारा मन होता कि हम भी उस विमान के पीछे चलते ही जाएं पर मोहल्ले की सुरक्षा से बंधे हम बच्चे ऐसा कभी नहीं कर पाते और इस बात का इंतज़ार करते कि कब हमें मेले जाने को मिले। बचपन में रामलीला हम बच्चों के लिए मेले वाले दिन थे। जिसके शुरू होने से पहले ही पैसे जोड़ने की जुगाड़ की जाती। ज़्यादा नहीं, दस बीस रुपए मिलते होंगे शायद उस समय जो हम बच्चों के झूला झूलने,सोफ्टी खाने ,गोलगप्पे खाने, सब कामों के लिए काफ़ी थे। मेरे मोहल्ले के सब बच्चे एक साथ मेले जाते इस सीख के साथ कि हम सब एक दूसरे का हाथ पकड़े रहेंगे। मेले में बड़ी दुकानों पर सजी महँगी चीज़ों से हमारा कोई वास्ता नहीं था, मन लेना भी चाहे तो मन को समझा लेते कि पापा के साथ आकर लेंगे। हजारों की भीड़ में जाने पहचाने चेहरे, लाउड स्पीकर पर बजते पुराने गाने और कभी – कभी बच्चे खोने की सूचना, कानों में पड़ती रामलीला वाली प्रचलित ध्वनि जो कस्बे का हर व्यक्ति पहचानता है। आज भी नवमी और दशमी को जब विमान के साथ ये धुन कस्बें की सड़कों से होकर घरों तक पहुंचती है तो चबूतरे, छतें, छज्जे लोगों से भर जाते हैं। ख़ास बात ये है कि भगवान राम का ये विमान कोई वाहन नहीं बल्कि लकड़ी का एक डोला होता है जिसे एक विशेष जाति के लोग कंधे पर उठाकर चलते हैं। जसवंतनगर का दशहरा  ------------------------------ मेरे कस्बे का दशहरा भी बेहद ख़ास है क्योंकि देश में वैसे तो दशहरा भगवान राम के हाथों रावण के वध और उसके बड़े-बड़े पुतले फूँककर मनाया जाता है, पर उत्तरप्रदेश के इटावा जिले के पास बसे मेरे छोटे से कस्बे जसवंतनगर में रावण को फूँका नहीं जाता बल्कि इस दिन दोपहर के तकरीबन तीन बजे जब रावण बना व्यक्ति अपने विमान पर सवार होकर कस्बे की सड़कों से गुजरता है तो उसकी प्रतीक्षा में खड़े लोग उसकी पूजा करते हैं, भव्य आरती उतारते ह यहाँ के जैन मोहल्ले में एक बड़े से थाल में किलो भर कपूर और खरपुरी ( बड़ा बताशा ) लेकर रावण की सार्वजनिक आरती होती हैं, उसे माला पहनाई जाती है और ये माला प्लास्टिक की कई बॉल मिलाकर बनाई जाती है। इस दौरान नगरवासी अपने माथे पर पीला टीका भी लगाते हैं। मान्यता है कि रावण भी अपने माथे पर त्रिपुंड लगाता था। इस बीच राम और रावण की सेनाओं के बीच नगर की सड़कों पर तीरों, तलवारों, ढालों, बरछी, भालों से युद्ध का प्रदर्शन होता है। बचपन में जब इस युद्ध को देखते हुए उनके धनुष से निकला तीर हमारे हाथ लगता तो हमारे गुरुर का ठिकाना ही नहीं रहता। जैसे तीर मारना बड़ी बात है, उस वक़्त हम बच्चों के लिए वो उनका तीर मिलना बहुत बड़ी बात थी। इस रामलीला की एक और जो सबसे ख़ास बात है वो ये कि जब दशहरे के दिन पंचक मुहुर्त में रात तकरीबन दस बजे, यहाँ के रामलीला मैदान में रावण के पुतले का प्रतीकात्मक वध किया जाता है तो पुतले के गिरते ही भीड़ इस पर टूट पड़ती है और इसके छोटे-छोटे टुकड़ों को अपने घर ले जाकर सहेजती है। ऐसी मान्यता है कि इन टुकड़ों को रखने से बच्चों को बुरी नज़र नहीं लगती, घर के सदस्यों को बाधाएं नहीं सताती, रोग व अकाल मौत नहीं होती व व्यापार में लाभ होता है। मेरे बचपन में पापा भी रामलीला मैदान से लौटते हुए इन टुकड़ो के साथ एक और चीज़ जरूर लाते, वो थीं गरम – गरम इमरतियां।  क़स्बे में इस दिन रावण वध के बाद हर हलवाई अपनी भट्टी पर बैठा इमरतिया निकाल रहा होता है। दुकानों के आसपास के गांववालों की भारी भीड़ होती है… सड़के मोहल्ले, गालियाँ लोगों से रात भर गुलज़ार रहते हैं। ऐसी ही तमाम यादें हैं जो अक्टूबर आते ही मेरे मन के कोने में दस्तक देने लगती हैं। कस्बे का हर व्यक्ति, भले ही वो कस्बे में हो या मेरी तरह हज़ारों मील दूर, उसे रह – रहकर रामलीला और मेला ही याद आता है।

रामलीला में  युद्ध का दृश्य

रावण की उतारती जसवंतनगर की भीड़ -----------------

  पूजा व्रत गुप्ता मूल रूप से जसवंतनगर की निवासिनी और एक लेखिका और कहानीकार हैं। वह इधर  डेढ़ वर्ष से अपने परिवार के संग ऑस्ट्रेलिया के मेलबोर्न शहर में जाकर बस गयीं है। वहां बैठी अपनी बचपन की आंखों देखी राम लीला को देख यादों में आंखे नम किये हैं।

रिपोर्टर:-वेदव्रत गुप्ता

I think all aspiring and professional writers out there will agree when I say that ‘We are never fully satisfied with our work. We always feel that we can do better and that our best piece is yet to be written’.
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