पितरों को दें तर्पण, पूर्वजों की कृपा से पाएं सुख समृद्धि

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बरेली:- पितृपक्ष की शुरुआत मंगलवार से शुरू हो चुकी है। पितरों को समर्पित अश्विन मास की भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन माह की अमावस्या तक इसे मनाया जाता है। 16 दिनों के लिए पितृ घर में विराजमान होते है जोकि हमारे परिवार का कल्याण करते है। इस बार पितृ पक्ष एक सितंबर से प्रारंभ हो रहे है जोकि 17 सितंबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होंगे। हिन्दू धर्म के अनुसार श्राद्ध पक्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक कुल 16 दिनों तक चलता है। जिस दिन पूर्णिमा होती है उस दिन से श्राद्ध प्रारंभ मान लिया जाता। पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ इस बार एक सितंबर से होकर दो सितंबर तक रहेगा इसीलिए तारीख तो दो है परंतु तिथि एक ही है। शास्त्रों के अुनसार पितृपक्ष के दिनों पितरों को खुश किया जाता है। श्राद्ध पक्ष में दान की महिमा के बारे में भी बताया गया है कि इन दिनों क्या दान करना चाहिए। पौराणिक ग्रंथों में विस्तार से उल्लेख मिलता है कि श्राद्ध के इन दिनों में अनाज का दान करना बहुत ही शुभ माना गया है। अनाज में गेहूं-चावल का दान गरीबों और ब्राह्मणों को किया जाता है। इसके पीछे मंशा यह रहती है कि कोई भी व्यक्ति इन दिनों में भूखा न रहे। पूर्णिमा के दिन लोग गंगा स्नान को जाते है, वहां पूर्वजों को तर्पण देने के साथ ही घर चलने की प्रार्थना करते रहे। इसके बाद घरों में रोजना तर्पण पूजन किया जाता है, लेकिन इस बार कोरोना के चलते गंगा स्नान पर पाबंदी रहेगी, जिस कारण लोग घरों पर ही रहकर पूर्वजों को तर्पण करेंगे। मान्यता है कि पितृपक्ष पर श्राद्ध कर्म करने पर पितृदोषों से मुक्ति मिल जाती है। पितृपक्ष में जब पितरदेव धरती पर आते हैं उन्हें प्रसन्न कर फिर से पितरलोक में विदा किया जाता है। ऐसे में पितृपक्ष के दौरान कुछ विशेष सावधानियां बरतनी चाहिए। 1- श्राद्ध पक्ष में अगर कोई भोजन पानी मांगने आए तो उसे खाली हाथ नहीं जाने दें। मान्यता है कि पितर किसी भी रूप में अपने परिजनों के बीच में आते हैं और उनसे अन्न पानी की चाहत रखते हैं। 2- गाय, कुत्ता, बिल्ली, कौआ इन्हें श्राद्ध पक्ष में मारना नहीं चाहिए, बल्कि इन्हें खाना देना चाहिए। 3- मांसाहारी भोजन जैसे मांस, मछली, अंडा के सेवन से परहेज करना चाहिए। शराब और नशीली चीजों से बचें। 4- परिवार में आपसी कलह से बचें। ब्रह्मचर्य का पालन करें, इन दिनों स्त्री पुरुष संबंध से बचना चाहिए। 5- नाखून, बाल एवं दाढ़ी मूंछ नहीं बनाना चाहिए। क्योंकि श्राद्ध पक्ष पितरों को याद करने का समय होता है। यह एक तरह से शोक व्यक्त करने का तरीका है। पितृ पक्ष में किस दिन करें श्राद्ध दरअसल, दिवंगत परिजन की मृत्यु की तिथि में ही श्राद्ध किया जाता है। उदाहरण के तौर पर यदि आपके किसी परिजन की मृत्यु प्रतिपदा के दिन हुई है तो प्रतिपदा के दिन ही उनका श्राद्ध किया जाना चाहिए। आमतौर पर इसी तरह से पितृ पक्ष में श्राद्ध की तिथियों का चयन किया जाता है:- - जिन परिजनों की अकाल मृत्यु या फिर किसी दुर्घटना या आत्महत्या का मामला है तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है। - दिवंगत पिता का श्राद्ध अष्टमी और मां का श्राद्ध नवमी के दिन किया जाता है। - जिन पितरों के मरने की तिथि न मालूम हो, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन करना चाहिए। - यदि कोई महिला सुहागिन मृत्यु को प्राप्त हुई तो उनका श्राद्ध नवमी को करना चाहिए। - सन्यासी का श्राद्ध द्वादशी के दिन किया जाता है।

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